ट्रैक्टेटस लॉजिको-फ़िलोसॉफ़िकस (tree-like view)

 ट्रैक्टेटस लॉजिको-फ़िलोसॉफ़िकस 


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Ludwig Wittgenstein

ट्रैक्टेटस लॉजिको-फ़िलोसॉफ़िकस (tree-like view)

 

This digital edition is based on Ludwig Wittgenstein. ट्रैक्टेटस लॉजिको-फ़िलोसॉफ़िकस. Translated by Ashok Vohra, Bharatiya Jnanpith, 2016. The original-language text is in the public domain in its country of origin and other countries and areas where the copyright term is the author’s life plus 70 years or fewer; additionally, it is in the public domain in the United States, because it was published before 1 January 1931. The translation was kindly released by Prof. Ashok Vohra under the Creative Commons Attribution-ShareAlike licence. The web edition was created by Michele Lavazza and proofread under the supervision of Désirée Weber from the College of Wooster. This web edition was first published on the website of the Ludwig Wittgenstein Project in 2026.

This is a "Scholarly Approved" translation


लुडविग विट्गेंस्टाइन

ट्रैक्टेटस लॉजिको-फ़िलोसॉफ़िकस


अपने मित्र डेविड एच. पिन्सेन्ट की स्मृति को समर्पित


ध्येय : ... और मनुष्य और मनुष्य जो कुछ भी जानता है, जो महज़ सुना-सुनाया गुलगपाड़ा और शोर-शराबा नहीं है, उसे तीन शब्दों में कहा जा सकता है।

— कूर्बर्गर


प्राक्कथन

संभवतः इस पुस्तक को सिर्फ वही समझ पाएगा जिसने पहले से ही इसमें अभिव्यक्त विचारों या कम से कम उनसे मिलते-जुलते विचारों पर मनन किया हो। इसलिए यह कोई पाठ्य पुस्तक नहीं है। इसको पढ़कर समझने वाले किसी एक व्यक्ति को भी यदि यह पुस्तक आनन्द प्रदान करे तो यह अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हो जाएगी।

यह पुस्तक दार्शनिक समस्याओं से सरोकार रखती है और मेरी सोच के अनुसार इसमें यह सिद्ध किया गया है कि हमारी भाषा की गलत समझ ही इन समस्याओं की उत्पत्ति का कारण है। इस पुस्तक के सार-संक्षेप को निम्नलिखित शब्दों में कहा जा सकता है : जो कुछ भी कहा जा सकता है उसकी सहज एवं स्पष्ट अभिव्यक्ति होनी चाहिए, और जो बात कही नहीं जा सकती वहाँ मौन ही श्रेयस्कर है।

अतः, इस पुस्तक का उद्देश्य विचारों की — बल्कि विचारों के बजाय विचारों की अभिव्यक्ति की सीमा का निर्धारण करना है : क्योंकि विचारों की सीमा निर्धारित करने के लिए, हमें उसके दोनों छोरों की कल्पना करनी होगी (यानी हममें अचिन्त्य पर भी चिन्तन करने का सामर्थ्य होना चाहिए)।

यह सीमा-निर्धारण भाषा में ही किया जा सकता है, और भाषा की इस सीमा के पार सब कुछ निरर्थक ही है।

मेरे प्रयासों का दूसरे दार्शनिकों से क्या साम्य-वैषम्य है, इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। वस्तुत :, यहाँ मौलिकता का मेरा कोई दावा भी नहीं है और किसी सन्दर्भ का न दिया जाना केवल इस बात का सूचक है कि मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि ये विचार मुझसे पहले भी किसी अन्य व्यक्ति को सूझ गए थे।

यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त है कि फ्रेगे की महान कृतियों, और अपने मित्र बटैंड रसेल की रचनाओं ने मुझे चिन्तन के लिए प्रेरित किया और इसलिए मैं इन दोनों महानुभावों का आभारी हूँ।

इस कृति का यदि कोई महत्त्व है तो वह दो बातों में है : पहली बात तो यह है कि इसमें विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति है, और इस परिप्रेक्ष्य में विचारों की जितनी स्पष्ट अभिव्यक्ति होगी, उतना ही तीर लक्ष्य को भेद सकेगा — उतना ही इसका महत्त्व बढ़ेगा। — मैं इस बारे में सचेत हूँ कि यहाँ मैं इस लक्ष्य से बहुत पीछे रह गया हूँ। कारण इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपेक्षित सामर्थ्य की मुझमें कमी का होना है। ईश्वर करे अन्य लोग मुझसे बेहतर इस कार्य को पूरा करें।

पर मुझे यहाँ अभिव्यक्त विचारों की सत्यता अकाट्य और निर्णायक प्रतीत होती है। इसलिए मैं यह समझता हूँ कि समस्त महत्त्वपूर्ण विषयों और समस्याओं का मुझे समुचित निदान मिल गया है। यदि मेरा मानना गलत नहीं है तो इस पुस्तक की अन्यतम खूबी इस बात का पता चलना है कि इन समस्याओं का निदान कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है।

— लुडविग विट्गेन्स्टाइन

वियना, 1918




[विस्तृत करें]1 जो कुछ है वही संसार है।[1]
[विस्तृत करें]2 जो कुछ भी है — वह एक तथ्य है — वही वस्तुस्थितियों का होना है।
[विस्तृत करें]3 विचार तथ्यों का तार्किक चित्र होता है।
[विस्तृत करें]4 विचार सार्थक प्रतिज्ञप्ति ही है।
[विस्तृत करें]5 प्रतिज्ञप्ति, प्राथमिक प्रतिज्ञप्तियों की सत्यात्मक-फ़लनक होती है।

(प्राथमिक प्रतिज्ञप्ति स्वयं अपनी ही सत्यात्मक फ़लनक होती है।)

[विस्तृत करें]6 सत्यात्मक फ़लन का सामान्य आकार [math]\displaystyle{ [ \bar{p}, \bar{\xi}, N (\bar{\xi}) ] }[/math] होता है।

यह प्रतिज्ञप्ति का सामान्य आकार है।

7 अनभिव्यंग्य के प्रति मौन रहना ही श्रेयस्कर है।



  1. प्रतिज्ञप्ति में प्रदर्शित दशमलव अंक मेरी व्याख्या में उसके तार्किक महत्त्व को इंगित करता है। n.1, n.2, n.3 इत्यादि प्रतिज्ञप्ति संख्या n पर टिप्पणियाँ हैं; n. m1, n.m2 इत्यादि प्रतिज्ञप्तियाँ प्रतिज्ञप्ति संख्या n.m पर टिप्पणियाँ हैं; इत्यादि।